सत्य का दर्पण: जीवन के पहलू
पेट भरा हो जब इंसान का,
कहाँ पता चले फिर स्वाद पकवान का।
घूम गया हो जब मत इंसान का,
कहाँ पता चले फिर सही - गलत ज्ञान का।
अहंकार चढ़ा हो जब किसी पद - नाम का,
कहाँ मूल्य रहे फिर किसी के सम्मान का।
लालच बढ़े जब किसी इंसान का
कहाँ ध्यान रहे फिर रिश्ते- ईमान का।
जब वक़्त बदल जाए किसी इंसान का,
कहाँ सुध रहे फिर किसी के भाव का।
जब वक़्त बदल जाए किसी इंसान का,
कहाँ सुध रहे फिर किसी के भाव का।
ऊँचाई छू ले जब किसी के पाँव का,
कहाँ ध्यान रहे फिर टूटे लगाव का।
— Ranjeet Sharma
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